
पारदर्शी विकाश न्यूज़ लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अहम फैसले में कहा है कि एनडीपीएस एक्ट के तहत दायर परिवाद मामलों में आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना अदालत संज्ञान नहीं ले सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223(1) का पालन अनिवार्य है और बिना सुनवाई के संज्ञान लेना कानूनी रूप से गलत है।यह आदेश न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की एकल पीठ ने शत्रुघ्न कुमार की याचिका पर दिया। याचिका में लखनऊ के विशेष एनडीपीएस न्यायाधीश द्वारा 14 जुलाई 2025 को दिए गए संज्ञान आदेश को चुनौती दी गई थी।कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत के आदेश में आरोपी को सुनवाई का अवसर देने का कोई उल्लेख नहीं था, केवल दस्तावेजों के आधार पर संज्ञान लिया गया था, जो प्रक्रिया का उल्लंघन है।हाईकोर्ट ने आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को 29 मई को निचली अदालत में पेश होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। अब मामला दोबारा सुनवाई के बाद नए सिरे से तय किया जाएगा।