
पारदर्शी विकास न्यूज़ बांदा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अंत्योदय और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के कल्याण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इसी कड़ी में मछुआ समाज (निषाद, कश्यप, केवट, बिंद आदि) के आर्थिक स्वावलंबन और कल्याण के लिए जनपद बांदा की बबेरू तहसील में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबका साथ, सबका विकास के संकल्प को धरातल पर उतारते हुए बबेरू तहसील के विभिन्न ग्राम सभाओं में स्थित तालाबों, पोखरों, मीनाशयों और जल प्रणालियों को 10 वर्ष के दीर्घकालिक पट्टे पर आवंटित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह कदम स्थानीय मछुआ समुदाय के लिए रोजगार और समृद्धि के नए द्वार खोलेगा। जिसको लेकर मछली पालन करने वाले ऐसे लोगों में काफी उत्साह है। योगी सरकार की भ्रष्टाचार मुक्त नीति के तहत यह पूरी आवंटन प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी तरीके से संपन्न की जा रही है। उप्र राजस्व संहिता नियमावली 2016 के नियम 57 और 58 के कड़े प्रावधानों के तहत आगामी 8 जुलाई को को बबेरू तहसील कार्यालय के सभागार में एक विशाल शिविर का आयोजन किया जाएगा। नायब तहसीलदार की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले इस शिविर में सभी इच्छुक पात्र व्यक्तियों से प्रार्थना पत्र एकत्रित किए जाएंगे और विकास खंडवार पूरी निष्पक्षता के साथ पात्रता सूची तैयार की जाएगी। योगी सरकार ने हमेशा से शोषित और वंचित वर्गों के हितों को सर्वाेपरि रखा है। इस नीति के तहत 2 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले तालाबों के आवंटन में मछुआ समुदाय को प्रथम वरीयता दी जाएगी। इससे ग्रामीण स्तर पर पारंपरिक रूप से मत्स्य पालन से जुड़े परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा। छोटे तालाबों की न्यूनतम आरक्षित बोली 5000 रुपये प्रति हेक्टेयर और 2 हेक्टेयर से बड़े तालाबों के लिए पंजीकृत मत्स्यजीवी सहकारी समितियों के बीच 10000 रुपये प्रति हेक्टेयर तय की गई है। बोली लगाने से पूर्व 10 प्रतिशत जमानत राशि जमा करना अनिवार्य होगा। शिविर में आवेदन और पात्रता सूची के बाद यदि एक ही तालाब के लिए एक से अधिक दावेदार होते हैं तो पूरी पारदर्शिता के साथ नीलामी की जाएगी। विभाग की तरफ से यह कहा गया है कि आवेदकों को अपने प्रार्थना पत्र के साथ आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज संलग्न करने होंगे। योगी सरकार की इस कल्याणकारी योजना से न केवल बांदा के जल संसाधनों का सही उपयोग होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर नीली क्रांति को बढ़ावा मिलेगा। जिससे मछुआ समाज आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगा।