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“विकास के दावों की खुली पोल: नौबस्ता–बसंत विहार से लेकर पूरे कानपुर में जलभराव ने उजागर की हकीकत”

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जगनायक प्रधान 
Pardarshi Vikas News Kanpur
शहर में “ग्रीन कानपुर, क्लीन कानपुर” और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच एक बार फिर जमीनी हकीकत सामने आ गई है। यह स्थिति किसी पिछड़े गांव या छोटे कस्बे की नहीं, बल्कि लगातार विकसित हो रहे कानपुर शहर की है, जहां बड़े-बड़े नेता और अधिकारी रोज बैठकों व प्रेस कॉन्फ्रेंस में विकास के दावे करते हैं और कहते हैं कि शहर की सभी समस्याएं खत्म हो चुकी हैं। लेकिन नौबस्ता–बसंत विहार क्षेत्र में हर साल की तरह इस बार भी बारिश के बाद गंभीर जलभराव देखने को मिला। नाले ओवरफ्लो हो गए और गंदा पानी सड़कों पर फैलकर घरों के अंदर तक घुस गया। लोगों का कहना है कि यहां हालात ऐसे हो जाते हैं कि सुबह नींद से उठकर लोगों को चाय नहीं बल्कि घर के आसपास फैला नाले का पानी दिखाई देता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह समस्या सिर्फ नौबस्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शहर में फैली हुई है। गोविंद नगर, साकेत नगर, किदवई नगर जैसे कई इलाकों में भी हर साल यही स्थिति बनती है। बारिश होते ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

जूही पुल

हाल ही में जूही पुल का भी उदाहरण सामने आया, जहां करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद थोड़ी सी तेज बारिश में ही यातायात बंद करना पड़ता है। पुल पर रंग-रोगन कर सजावट तो कर दी गई, पानी निकालने के लिए मोटरें भी लगाई गईं, लेकिन फिर भी जलनिकासी की समस्या जस की तस बनी हुई है।

बीते दिनों नगर निगम की मेयर Pramila Pandey की अध्यक्षता में एक बैठक भी हुई

बीते दिनों नगर निगम की मेयर Pramila Pandey की अध्यक्षता में एक बैठक भी हुई, जिसमें अभियंत्रण विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी कि शहर के छह जोनों में कुल 220 बड़े नालों की सफाई कराई जानी है। इनमें से अब तक 67 नालों की सफाई पूरी हो चुकी है, जबकि 153 नालों की सफाई अभी शेष है या प्रक्रिया में है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि सभी नालों के टेंडर पहले ही हो चुके हैं और एक सप्ताह के भीतर शेष सभी बड़े नालों की सफाई का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब टेंडर पहले ही पूरे हो चुके थे तो सफाई का काम समय पर क्यों नहीं शुरू किया गया? और अगर कार्य शुरू होना था, तो मानसून से पहले तैयारी क्यों नहीं की गई?

स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल यही स्थिति दोहराई जाती है। बैठकों, टेंडरों और दावों के बावजूद जलभराव और नाले-नालियों की समस्या का स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल पाया है। जनता अब यह सवाल उठा रही है कि आखिर कब तक विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच इतना बड़ा अंतर बना रहेगा।

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