
Pardarshi Vikas News New Delhi
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामले पर सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति के छूने से देवता “अपवित्र” कैसे हो सकते हैं और क्या जन्म के आधार पर किसी भक्त को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि अगर कोई आस्तिक केवल अपने जन्म या वंश के कारण पूजा से वंचित किया जाता है, तो क्या ऐसे में संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा। जजों ने कहा कि आस्था और समानता के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है।
मंदिर पक्ष की ओर से दलील दी गई कि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है, इसलिए वहां की परंपराएं विशेष धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। वकील ने कहा कि धार्मिक प्रथाएं संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित हैं और उनमें बाहरी हस्तक्षेप उचित नहीं है।
इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया था। बाद में इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।
इस अहम मामले में कोर्ट का फैसला जल्द आने की संभावना है।