
PARDARSHI VIKASH NEWS इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था में लंबे समय से चल रही देरी पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “तारीख पर तारीख” केवल न्यायिक अधिकारियों की गलती नहीं है, बल्कि इसके लिए राज्य सरकार और पुलिस तंत्र भी बराबर जिम्मेदार हैं।कोर्ट ने फिल्म दामिनी के मशहूर संवाद “तारीख पर तारीख…” का जिक्र करते हुए कहा कि यह स्थिति आज भी कई मामलों में देखने को मिलती है, जो न्याय प्रणाली की गंभीर खामियों को दर्शाती है।जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने फतेहपुर से जुड़ी एक जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि पर्याप्त स्टाफ, पुलिस सहयोग और समय पर फॉरेंसिक रिपोर्ट के बिना कोई भी न्यायिक अधिकारी प्रभावी ढंग से मामलों का निपटारा नहीं कर सकता।कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला अदालतों में मामलों के लंबित रहने की बड़ी वजह मिनिस्टीरियल स्टाफ, स्टेनोग्राफर की कमी और पुलिस द्वारा समय पर गवाह पेश न करना है। साथ ही पुलिस की ओर से जांच और अदालती प्रक्रियाओं का सही पालन न होना भी देरी का कारण बनता है।अदालत ने पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि मॉनिटरिंग सिस्टम कमजोर है और कई बार वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में प्रतिनिधियों को भेज देते हैं। इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।कोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह की व्यवस्थागत देरी के कारण कई अपराधी बिना डर के अपराध करते रहते हैं, जिससे न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जाती।अंत में कोर्ट ने प्रमुख सचिव (कानून) को आदेश की प्रति मुख्यमंत्री के समक्ष रखने के निर्देश दिए और कहा कि मजबूत न्याय व्यवस्था के बिना लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है।