
Pardarshi Vikas News
ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह के युद्धविराम प्रस्ताव को फिलहाल खारिज कर दिया है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कालीबाफ ने साफ कहा कि मौजूदा हालात में सीजफायर तभी संभव है, जब अमेरिका समुद्री नाकेबंदी खत्म करे और दबाव की नीति छोड़े। उन्होंने कहा कि एकतरफा घोषणा को ईरान स्वीकार नहीं करेगा।
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच 22 अप्रैल को लागू अस्थायी युद्धविराम समाप्त हो गया था। इसके खत्म होने से पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे एकतरफा तरीके से आगे बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। इस पर तेहरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है।
उधर ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान के साथ शांति वार्ता के दूसरे दौर को लेकर शुक्रवार तक अच्छी खबर आ सकती है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद है कि अगले 36 से 72 घंटों में नई बातचीत शुरू हो सकती है। पाकिस्तान भी दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिशों में जुटा है।
हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह अमेरिका के साथ नए दौर की वार्ता में शामिल होगा या नहीं। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन धमकियां, सैन्य दबाव और आक्रामक कदम किसी भी सार्थक वार्ता को कमजोर करते हैं।
इस बीच खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने होर्मुज स्ट्रेट में दो जहाजों को कब्जे में लिया है। ईरान का कहना है कि इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। वहीं अमेरिका ने भी ईरानी जहाजों की आवाजाही पर दबाव बढ़ा दिया है।
तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर भी दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है और कई एयरलाइंस ने उड़ानें रद्द करनी शुरू कर दी हैं। यूरोप की बड़ी एयरलाइन लुफ्थांसा ने बढ़ती ईंधन लागत के कारण 20 हजार उड़ानें रद्द करने का फैसला किया है।
दूसरी ओर लेबनान मोर्चे पर भी हालात नाजुक बने हुए हैं। इजराइली सेना ने दक्षिण लेबनान में अपनी मौजूदगी जारी रखने की घोषणा की है। अमेरिका, इजराइल और लेबनान के प्रतिनिधियों के बीच वॉशिंगटन में दूसरे दौर की वार्ता होने जा रही है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की नजर अब अमेरिका-ईरान वार्ता पर टिकी है। यदि बातचीत शुरू नहीं होती, तो क्षेत्रीय संकट और गहरा सकता है, जिसका असर ऊर्जा सप्लाई, व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है।