
Pardarshi Vikas News New Delhi
केरल के सबरीमाला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक अधिकारों से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लगातार सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी स्वीकार नहीं कर सकती। यह टिप्पणी उस समय आई जब पक्षकारों की ओर से विभिन्न स्रोतों से ज्ञान लेने की दलील दी जा रही थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत में अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, संप्रदायों के अधिकार, महिलाओं के प्रवेश और सामाजिक सुधार जैसे संवैधानिक प्रश्नों पर बहस जारी है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि ज्ञान और जानकारी किसी भी स्रोत से मिले, उसका स्वागत होना चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं। वहीं CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि किसी लेख या सार्वजनिक राय को निजी मत ही माना जाएगा।
अदालत में यह भी बहस हुई कि क्या धार्मिक संप्रदायों को अपने रीति-रिवाज तय करने और मंदिरों में प्रवेश सीमित करने का अधिकार है, या फिर व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलेगी। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि किसी प्रथा को धार्मिक कैसे माना जाए और उसकी कसौटी क्या हो।
वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है, जबकि राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर हस्तक्षेप कर सकता है। दूसरी ओर, अदालत ने संकेत दिया कि कोई भी परंपरा संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हर धार्मिक प्रथा को आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता, खासकर जब वह समानता, गरिमा या सार्वजनिक हित के खिलाफ हो।
सबरीमाला विवाद 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश से जुड़ा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाई थी, जिसके बाद पुनर्विचार याचिकाओं पर यह विस्तृत सुनवाई जारी है। इस फैसले का असर देशभर के कई धार्मिक स्थलों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।