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मनरेगा कर्मियों का सरकार के खिलाफ बिगुल

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पारदर्शी विकास ब्यूरो कुशीनगर। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत पिछले दो दशकों से कार्यरत ग्राम रोजगार सेवकों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को उत्तर प्रदेश ग्राम रोजगार सेवक संघ के बैनर तले ग्राम रोजगार सेवकों ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को 10 सूत्रीय ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगों के शीघ्र समाधान की मांग की।संघ पदाधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2006 में मनरेगा योजना शुरू होने के बाद से ग्राम रोजगार सेवक गांवों में योजना के सफल क्रियान्वयन की रीढ़ बने हुए हैं। इसके बावजूद प्रदेश के 58 हजार से अधिक ग्राम रोजगार सेवकों का भविष्य अब भी असुरक्षित है। वे मनरेगा के अलावा प्रधानमंत्री आवास योजना, विभिन्न सर्वेक्षणों और अन्य सरकारी योजनाओं के संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।ज्ञापन में ग्राम रोजगार सेवकों को नियमित करने और न्यूनतम 36 हजार रुपये मासिक मानदेय निर्धारित करने की प्रमुख मांग उठाई गई है। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई के बीच वर्तमान मानदेय में परिवार का भरण-पोषण करना बेहद मुश्किल हो गया है।इसके अलावा, मनरेगा कार्यों की बेहतर मॉनिटरिंग के लिए उच्च गुणवत्ता वाले एंड्रॉयड मोबाइल और डेटा रिचार्ज की सुविधा, आकस्मिक एवं चिकित्सीय अवकाश, न्याय पंचायत स्तर पर स्थानांतरण व्यवस्था तथा मृतक आश्रितों को सेवा का लाभ देने जैसी मांगें भी ज्ञापन में शामिल हैं।ग्राम रोजगार सेवकों ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि 1 जुलाई 2026 तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो प्रदेशभर के रोजगार सेवक लखनऊ में विधानसभा का घेराव करेंगे। साथ ही रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक स्थलों और अन्य प्रमुख स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी किया जाएगा।संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि वर्षों से उन्हें केवल आश्वासन मिलते रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। ऐसे में अब आंदोलन ही उनके अधिकारों की लड़ाई का अंतिम विकल्प बचा है।