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सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हाईकोर्ट का फैसला

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उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर को झटका

PARDARSHI VIKASH NEWS नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उन्नाव रेप मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ा झटका दिया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी गई थी और हाई कोर्ट को इस पर पुन: सुनवाई करने का निर्देश दिया।
कुलदीप सेंगर को 2019 में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्नाव की नाबालिग पीड़िता से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने निलम्बित कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट या तो सेंगर की दोषसिद्धि के खिलाफ लंबित अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला करे या फिर सजा निलंबन की अर्जी पर नया आदेश पारित करे। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने सीबीआई की अपील पर आंशिक रूप से सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसके तहत सेंगर की सजा निलंबित कर उन्हें अपील लंबित रहने तक जमानत दी गई थी। हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद व्यापक सार्वजनिक नाराजगी सामने आई थी, जिसके बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।सुनवाई के दौरान सेंगर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने दलील दी कि रिकॉर्ड पर ऐसे मजबूत साक्ष्य हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग नहीं थी। इस पर सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस तर्क का विरोध किया। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने यह मानकर गलती की कि विधायक, पॉक्सो कानून के तहत “लोक सेवक” की श्रेणी में नहीं आता।न्यायमूर्ति बागची ने भी इस बिंदु पर सॉलिसिटर जनरल की दलील से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि अदालत हाईकोर्ट के “अत्यधिक तकनीकी” दृष्टिकोण का समर्थन नहीं कर रही है और यह ध्यान रखना होगा कि पॉक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि एक विधायक प्रभावशाली और प्रभुत्वशाली स्थिति में होता है, इसलिए ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या उद्देश्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए।दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर को राहत देते हुए कहा था कि पॉक्सो एक्ट की धारा 5(सी) और आईपीसी की धारा 376(2) के तहत गंभीर अपराध की धाराएं लागू नहीं होतीं, क्योंकि सेंगर को इन प्रावधानों के अर्थ में “लोक सेवक” नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सजा निलंबित की थी। सीबीआई ने इस निष्कर्ष को कानून की मंशा के विपरीत बताते हुए चुनौती दी थी। सीबीआई का कहना था कि पॉक्सो एक विशेष कल्याणकारी कानून है, जिसकी व्याख्या बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने वाली होनी चाहिए, न कि उसे सीमित करने वाली। एजेंसी ने यह भी तर्क दिया कि केवल लंबी कैद, उम्रकैद की सजा निलंबित करने का आधार नहीं हो सकती, खासकर तब जब मामला नाबालिग से दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध का हो। सीबीआई ने पीड़िता की सुरक्षा, आरोपी के प्रभाव और गवाहों पर संभावित असर का भी मुद्दा उठाया।सेंगर को 2019 में विशेष सीबीआई अदालत ने उन्नाव की नाबालिग पीड़िता से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह मामला देशभर में चर्चा में रहा था। सेंगर पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े एक अलग मामले में 10 साल की सजा भी काट रहा है। उस मामले में भी हाईकोर्ट उसकी सजा निलंबन की दूसरी अर्जी पहले ही खारिज कर चुका है।