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मोहर्रम पर शाही जरी और स्वर्ण अलम के जुलूस की मांग

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पारदर्शी विकास न्यूज़ लखनऊ। अफहाम-ए-जमा सोसाइटी के प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को जिलाधिकारी से मुलाकात कर मोहर्रम के अवसर पर पारंपरिक धार्मिक आयोजनों को पूर्ववत संचालित कराने की मांग उठाई। प्रतिनिधिमंडल में नवाब मसूद अब्दुल्ला, मीसम नकवी सहित कई सदस्य शामिल रहे। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि इस्लामिक माह मोहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौमे आशूरा के दिन छोटे इमामबाड़े से हुसैनाबाद ट्रस्ट की शाही जरी को पारंपरिक जुलूस के साथ उठाकर पूरे सम्मान के साथ दफन कराया जाए। साथ ही बादशाह मोहम्मद अली शाह बहादुर द्वारा बनवाए गए 72 तोले सोने के अलम को भी जुलूस में शामिल करने की अनुमति दी जाए। नवाब मसूद अब्दुल्ला ने बताया कि उनकी संस्था पिछले 22 वर्षों से लखनऊ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि हुसैनाबाद एंड एलाइड ट्रस्ट की स्थापना नवाबीन-ए-अवध द्वारा हजरत इमाम हुसैन की याद में की गई थी, जिसके माध्यम से मोहर्रम सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।उन्होंने बताया कि पहली मोहर्रम की शाही जरी, सातवीं मोहर्रम की शाही मेहंदी तथा दसवीं मोहर्रम की शाही जरी के जुलूस की ऐतिहासिक परंपरा रही है। वर्तमान में पहली और सातवीं मोहर्रम के जुलूस तो निकाले जाते हैं, लेकिन यौमे आशूरा का शाही जरी जुलूस नहीं निकल रहा है।प्रतिनिधिमंडल ने यह भी मांग की कि हुसैनाबाद ट्रस्ट द्वारा स्टेट बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखे गए 72 तोले सोने के अलम को बाहर निकालकर नौ मोहर्रम को छोटे इमामबाड़े में सजाया जाए तथा पारंपरिक जुलूस में शामिल किया जाए, ताकि जायरीन उसके दर्शन कर सकें। ज्ञापन में कहा गया कि शिया समुदाय में इस अलम का विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है।