
अरविन्द दुबे
पारदर्शी विकास न्यूज़ ।
मनुष्य का जीवन केवल जन्म लेने और सांस लेने का नाम नहीं है। जीवन की वास्तविक सुंदरता उसके विचारों, व्यवहार, संस्कारों और आचरण में दिखाई देती है। जिस प्रकार किसी पौधे पर फूल खिलने के बाद उसकी सुंदरता और सुगंध चारों ओर फैलती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठ आचरण का पुष्प खिलने पर उसका प्रभाव परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुंचता है। इसलिए प्रश्न यह है कि जीव का वास्तविक पुष्प कब खिलेगा? इसका उत्तर है—जब उसके भीतर श्रेष्ठ आचरण का जन्म होगा।श्रेष्ठ आचरण किसी एक दिन में विकसित नहीं होता। यह निरंतर अभ्यास, संस्कार, आत्मचिंतन और अच्छे कर्मों का परिणाम है। व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही धीरे-धीरे उसका व्यवहार बनने लगता है। विचार शुद्ध होंगे तो वाणी में मधुरता आएगी, वाणी मधुर होगी तो व्यवहार में विनम्रता आएगी और व्यवहार में विनम्रता होगी तो संबंधों में प्रेम तथा विश्वास बढ़ेगा। इसी क्रम में मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास होता है।आज के समय में शिक्षा को सफलता का सबसे बड़ा आधार माना जाता है। शिक्षा आवश्यक है, लेकिन केवल पुस्तकीय ज्ञान मनुष्य को श्रेष्ठ नहीं बना सकता। यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत ज्ञान हो, लेकिन वह दूसरों के प्रति सम्मान न रखता हो, अपने कर्तव्यों से भागता हो, असत्य बोलता हो या अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाता हो, तो उसकी शिक्षा अधूरी कही जाएगी। वास्तविक शिक्षा वही है जो मनुष्य को विवेकवान, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाए।श्रेष्ठ आचरण की पहली सीढ़ी है—सत्य। सत्य बोलना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि कई बार सत्य हमारे स्वार्थ के विरुद्ध होता है। फिर भी जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ देता है, उसके भीतर आत्मविश्वास और आत्मसम्मान मजबूत होता है। सत्य केवल शब्दों में नहीं, कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए। किसी से झूठ न बोलना, छल न करना, वचन का पालन करना और अपनी गलती स्वीकार करना भी सत्यनिष्ठ आचरण का हिस्सा है।दूसरी महत्वपूर्ण बात है—सम्मान। परिवार में माता-पिता, बुजुर्गों और शिक्षकों का सम्मान करना, बच्चों के प्रति स्नेह रखना, महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करना और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य के रूप में सम्मान देना अच्छे संस्कारों की पहचान है। पद, पैसा या प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति के सम्मान का एकमात्र आधार नहीं हो सकते। वास्तविक संस्कार तब दिखाई देते हैं, जब व्यक्ति अपने से कमजोर या जरूरतमंद व्यक्ति के साथ भी सम्मानपूर्वक व्यवहार करता है।श्रेष्ठ आचरण का संबंध सेवा से भी है। सेवा केवल बड़े सामाजिक कार्य करने का नाम नहीं है। किसी परेशान व्यक्ति की सहायता करना, भूखे को भोजन देना, बीमार की देखभाल करना, किसी बुजुर्ग की बात ध्यान से सुनना, रास्ते में पड़े कचरे को उठाकर उचित स्थान पर डालना या किसी अनजान व्यक्ति को सही रास्ता बताना भी सेवा है। छोटे-छोटे अच्छे कार्य ही धीरे-धीरे समाज में सकारात्मक वातावरण बनाते हैं।मनुष्य के आचरण की सबसे बड़ी परीक्षा उसके क्रोध के समय होती है। सामान्य परिस्थितियों में विनम्र रहना आसान है, लेकिन अपमान, विरोध या कठिनाई के समय स्वयं पर नियंत्रण रखना वास्तविक संस्कार है। क्रोध में बोले गए शब्द कई बार वर्षों के संबंधों को चोट पहुंचा देते हैं। इसलिए संयम को जीवन का महत्वपूर्ण गुण बनाना आवश्यक है। बोलने से पहले सोचना और प्रतिक्रिया देने से पहले परिस्थिति को समझना व्यक्ति को अनेक गलतियों से बचा सकता हैआज परिवारों के सामने भी एक बड़ी चुनौती है। बच्चों को सुविधाएं देने की होड़ में कहीं-कहीं संस्कार पीछे छूटते जा रहे हैं। बच्चे केवल स्कूल और पुस्तकों से नहीं सीखते, वे घर के वातावरण से भी सीखते हैं। माता-पिता जिस प्रकार एक-दूसरे से बात करते हैं, बुजुर्गों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं और कठिन परिस्थितियों में जिस प्रकार निर्णय लेते हैं, बच्चे उसी को अपने जीवन में उतारते हैं। इसलिए बच्चों को अच्छे संस्कार देने का सबसे प्रभावी माध्यम स्वयं श्रेष्ठ आचरण करना हैपरिवार समाज की पहली पाठशाला है। यदि परिवार में प्रेम, अनुशासन, सहयोग और सम्मान का वातावरण होगा तो बच्चे भी इन्हीं मूल्यों को ग्रहण करेंगे। परिवार में संवाद कम होने और मोबाइल तथा डिजिटल माध्यमों पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ने से आपसी दूरी बढ़ सकती है। ऐसे समय में परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के लिए समय निकालना चाहिए। साथ बैठकर भोजन करना, बुजुर्गों से बातचीत करना और बच्चों की समस्याओं को सुनना भी संस्कार निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम है।श्रेष्ठ आचरण का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कभी गलती न करे। मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। वास्तविक श्रेष्ठता इस बात में है कि गलती होने के बाद व्यक्ति उसे स्वीकार करे, उससे सीख ले और उसे दोहराने से बचे। अपनी गलती स्वीकार करने वाला व्यक्ति छोटा नहीं होता, बल्कि वह आत्मचिंतन की क्षमता दिखाता है। अहंकार व्यक्ति को अपनी कमियों से दूर रखता है, जबकि विनम्रता उसे सुधार का अवसर देती है।समाज में शांति और समरसता के लिए भी श्रेष्ठ आचरण आवश्यक है। जाति, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति या किसी अन्य आधार पर व्यक्ति के प्रति घृणा का भाव समाज को कमजोर करता है। विविधता के बीच सम्मान और सहयोग की भावना ही मजबूत समाज का आधार बनती है। यदि हम अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करें तो सामाजिक तनाव कम हो सकता है।प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार भी हमारे आचरण का हिस्सा है। पेड़-पौधों की रक्षा करना, जल बचाना, स्वच्छता बनाए रखना, प्लास्टिक का अनावश्यक उपयोग कम करना और सार्वजनिक स्थानों को साफ रखना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिक का व्यवहार ही किसी शहर और समाज की वास्तविक संस्कृति को दर्शाता है। प्रकृति के प्रति संवेदनशील व्यक्ति आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी जिम्मेदारी निभाता है।राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों या संस्थाओं का कार्य नहीं है। एक ईमानदार कर्मचारी, जिम्मेदार व्यापारी, संवेदनशील शिक्षक, कर्तव्यनिष्ठ चिकित्सक, मेहनती किसान, अनुशासित विद्यार्थी और जागरूक नागरिक—सभी अपने-अपने स्थान पर राष्ट्र निर्माण में योगदान देते हैं। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाता है, तब राष्ट्र मजबूत होता है। इसलिए श्रेष्ठ आचरण व्यक्तिगत गुण होने के साथ-साथ सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलने का प्रयास करें। हम अक्सर समाज की समस्याओं के लिए दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन आत्मचिंतन कम करते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन स्वयं से पूछे कि आज मैंने किसकी सहायता की, किसका सम्मान किया, किस गलती से बचा और अपने परिवार तथा समाज के लिए क्या अच्छा किया, तो धीरे-धीरे उसके भीतर परिवर्तन शुरू हो सकता है।जीवन का वास्तविक सौंदर्य बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आचरण की सुगंध में है। धन, पद और प्रतिष्ठा समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन अच्छे व्यवहार की स्मृति लंबे समय तक रहती है। किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसके अच्छे कर्म और संस्कार लोगों के बीच जीवित रहते हैं। यही उसके जीवन का वास्तविक परिचय बनते हैं।इसलिए कहा जा सकता है कि जीव का पुष्प तभी खिलेगा, जब श्रेष्ठ आचरण जीवन का हिस्सा बनेगा। जब विचारों में शुद्धता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता, कर्मों में ईमानदारी, हृदय में करुणा और जीवन में सेवा का भाव होगा, तभी मनुष्य का व्यक्तित्व वास्तव में विकसित होगा। श्रेष्ठ आचरण कोई दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में किए जाने वाले छोटे-छोटे सही निर्णयों का परिणाम है।हमें अपने भीतर ऐसे संस्कारों का बीज बोना होगा, जो आने वाली पीढ़ियों में भी फल दें। परिवार से शुरुआत करनी होगी, बच्चों को केवल सफलता नहीं बल्कि संस्कार भी देने होंगे और समाज में अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। जब व्यक्ति स्वयं सुधरेगा, परिवार मजबूत होगा; परिवार मजबूत होगा तो समाज मजबूत होगा और समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र भी सशक्त होगा।अंततः मनुष्य का जीवन तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उसके अस्तित्व से किसी दूसरे के जीवन में प्रकाश, विश्वास, सहयोग और आशा का संचार हो। जिस दिन हमारे कर्मों में मानवता और व्यवहार में श्रेष्ठता आ जाएगी, उसी दिन जीवन का वास्तविक पुष्प खिल उठेगा। श्रेष्ठ आचरण होगा जब से, तभी जीवन में सच्चे अर्थों में पुष्प खिलेगा।