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इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टि और प्रमाणिक स्रोतों पर जोर

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पारदर्शी विकास न्यूज़ | वाराणसी। भारतीय इतिहास संकलन समिति, काशी प्रान्त के तत्वावधान में पार्श्वनाथ विद्यापीठ, करौंदी स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सभागार में ‘इतिहास प्रयोजन : अध्ययन, अनुसंधान और लेखन के संदर्भ में’ विषय पर वरिष्ठ इतिहासकारों की एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुई। कार्यशाला में इतिहास के अध्ययन, शोध, स्रोतों और लेखन की पद्धति को लेकर गंभीर मंथन किया गया।

चार सत्रों में आयोजित कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए इतिहासकारों और विद्वानों ने अपने विचार रखे। मुख्य वक्ता बालमुकुन्द पाण्डेय ने इतिहास लेखन में निष्पक्ष एवं राष्ट्रीय दृष्टि अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास लेखन में मूल स्रोतों से तथ्यों का मिलान आवश्यक है। वरिष्ठ इतिहासकारों का दायित्व केवल इतिहास का निर्माण करना नहीं, बल्कि समाज निर्माण में भी योगदान देना है।

प्रो. आनन्द शंकर सिंह ने कहा कि इतिहास अध्ययन का उद्देश्य केवल सूचनाओं और आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना का निर्माण होना चाहिए। द्वितीय सत्र में कृषि, उद्योग और व्यापार को राष्ट्र की समृद्धि के प्रमुख आधार बताते हुए प्राचीन भारत की आर्थिक समृद्धि पर चर्चा हुई।

कार्यशाला में वक्ताओं ने प्राथमिक एवं प्रमाणिक स्रोतों के उपयोग, वैज्ञानिक शोध पद्धति और भारतीय इतिहास-बोध को इतिहास लेखन में उचित स्थान देने पर बल दिया। प्रो. अनुराधा सिंह, प्रो. रचना सिंह, प्रो. संतोष कुमार, प्रो. सारिका सिंह, प्रो. ऋतु जायसवाल सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।