
स्वराज्य का आधार स्वबोध और अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति गौरव-बोध है :- स्वामी माधवप्रियदास जी
स्वबोध ही स्वराज्य को सार्थक बनाता है :- प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल
वाराणसी । हिंदी दिवस के अवसर पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शन संकाय द्वारा योगसाधना केन्द्र में ‘स्वराज्य, स्वबोध और भारतीय भाषाओं की भूमिका’ विषय पर विशेष व्याख्यान एवं विचार-विमर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता स्वामीनारायण गुरुकुल विश्वविद्यालय प्रतिष्ठानम्, गुजरात के अध्यक्ष एवं वेदान्तशास्त्र के विश्वविख्यात आचार्य स्वामी माधवप्रियदास जी रहे। इस अवसर पर उनके द्वारा रचित ‘श्रीस्वामीनारायणदर्शनसारसंग्रह’ ग्रंथ का लोकार्पण भी किया गया। स्वामी माधवप्रियदास जी ने कहा कि गुरु के बिना ग्रंथों का ज्ञान अधूरा है, क्योंकि गुरु ही शास्त्रीय ज्ञान का जीवन एवं साधना से समन्वय कर उसका वास्तविक बोध कराते हैं। उन्होंने कहा कि स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि स्वच्छ, आत्मनिर्भर एवं अपनी अस्मिता के प्रति जागृत भारत का निर्माण है।उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति विविधता में एकता में निहित है। भारतीय भाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता, संस्कार और ज्ञान-परम्परा की जीवंत वाहक हैं। वेद और प्राचीन शास्त्रों ने ही हमें स्वराज्य एवं स्वबोध की मूल चेतना प्रदान की है। इसलिए शास्त्रों के संरक्षण के साथ भाषा के प्रति गौरव-बोध भी आवश्यक है। उन्होंने डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं एवं शास्त्रीय ग्रंथों के संरक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से ज्ञान-परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए तथा वेद-शास्त्रों में निहित ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में अध्ययन एवं अनुसंधान किया जाए।अध्यक्षीय उद्बोधन एवं बीज वक्तव्य में प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि स्वराज्य की सार्थकता स्वबोध से है। अपनी भाषा, संस्कृति, परम्परा और ज्ञान-स्रोतों का बोध ही स्वतंत्रता को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस को केवल हिंदी के प्रचार तक सीमित न रखकर समस्त भारतीय भाषाओं के सम्मान एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्बोध का अवसर बनाना चाहिए। कार्यक्रम संयोजक एवं वेदान्त विभागाध्यक्ष प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि भारतीय भाषाओं में हमारी संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म और जीवन-दृष्टि का अमूल्य ज्ञान सुरक्षित है। अतः भाषा का संरक्षण वास्तव में भारतीय ज्ञान और संस्कारों का संरक्षण है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों से भारतीय ग्रंथों के अध्ययन, संरक्षण एवं व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया ।।