
PARDARSHI VIKASH NEWS आईटी, कानून, कॉमर्स, ट्रांसलेशन, डिजाइन और लाइब्रेरी साइंस जैसे कई पारंपरिक क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का असर तेजी से दिखने लगा है। जहां पहले इन डिग्रियों के आधार पर लाखों छात्रों को रोजगार मिलता था, वहीं अब AI टूल्स ने कई कामों को या तो ऑटोमेट कर दिया है या उनका दायरा काफी सीमित कर दिया है।टीमलीज के अनुसार, करीब 40% कंपनियां अब ‘हाइब्रिड स्किल’ को जरूरी मानने लगी हैं, यानी डिग्री के साथ AI टूल्स की जानकारी भी अनिवार्य हो गई है। नैस्कॉम की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 82% बीसीए और एमसीए ग्रेजुएट्स के पास AI की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि भविष्य में वही लोग आगे रहेंगे जो AI की मदद से अपनी उत्पादकता 40% तक बढ़ा सकें। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि AI सीधे नौकरियां नहीं छीनेगा, लेकिन AI का इस्तेमाल जानने वाले लोग उन लोगों की जगह ले सकते हैं जो इसका उपयोग नहीं करते।इसी बीच एक्सपर्ट्स का कहना है कि पारंपरिक डिग्री का महत्व पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका स्वरूप जरूर बदल रहा है। अब बाजार में थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल स्किल्स, लाइव प्रोजेक्ट और AI आधारित काम की मांग बढ़ रही है। खासकर शुरुआती स्तर की नौकरियों में दबाव इसलिए बढ़ा है क्योंकि AI की मदद से कम लोगों में ज्यादा काम किया जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में ‘डिग्री’ से ज्यादा ‘परफॉर्मेंस’ और ‘प्रैक्टिकल स्किल’ निर्णायक होंगे। यानी वे लोग आगे रहेंगे जो AI टूल्स के साथ काम करके खुद को ज्यादा उत्पादक (10x प्रोफेशनल) बना सकें।चीन जैसे देश भी इस बदलाव के अनुसार अपने शिक्षा ढांचे को तेजी से बदल रहे हैं, जहां हजारों पुराने कोर्स बंद कर नए तकनीकी और AI आधारित प्रोग्राम शुरू किए जा रहे हैं।कुल मिलाकर संकेत साफ हैं कि भविष्य की नौकरी उसी के पास होगी जो AI को सिर्फ समझेगा नहीं, बल्कि उसे अपने काम का हिस्सा बनाकर बेहतर आउटपुट देगा।