
Pardarshi Vikas News Delhi
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू कर दी है। यह सुनवाई न सिर्फ सबरीमाला विवाद, बल्कि विभिन्न धर्मों में महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अहम सवालों पर व्यापक असर डाल सकती है।
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने अपने लिखित जवाब में स्पष्ट किया कि यह मामला धार्मिक आस्था और किसी विशेष संप्रदाय के अपने नियम तय करने के अधिकार से जुड़ा है। सरकार ने कहा कि अदालत को ऐसे मामलों में सीमित दखल देना चाहिए और धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि यह प्रतिबंध महिलाओं की शुद्धता या समानता से नहीं, बल्कि मंदिर की विशिष्ट धार्मिक परंपरा से संबंधित है। यदि इसमें बदलाव किया जाता है, तो पारंपरिक पूजा-पद्धति प्रभावित हो सकती है और धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि, इसके खिलाफ 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब विस्तृत सुनवाई हो रही है। 2019 में यह मामला बड़ी संविधान पीठ को भेजा गया था, जिसने इसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों से जोड़ दिया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने महिलाओं के साथ भेदभाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी महिला को कुछ दिनों के लिए ‘अछूत’ मानना और फिर सामान्य मान लेना तर्कसंगत नहीं है। वहीं, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के बीच संतुलन तय करना होगा।
यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इसमें मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना, और पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। अदालत यह तय करेगी कि क्या धार्मिक प्रथाएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं या नहीं।
सुनवाई 22 अप्रैल तक जारी रहेगी। इसके फैसले से देश में धर्म और समानता के बीच संतुलन की नई संवैधानिक व्याख्या सामने आ सकती है।