
पारदर्शी विकास न्यूज़ कानपुर। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-2023 के अनुरूप त्रि-भाषा नीति लागू करने के निर्णय का स्वागत किया है। परिषद ने इसे भारतीय भाषाओं के सुदृढ़ीकरण, भाषाई विविधता के संरक्षण और ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। अभाविप ने मांग की है कि केवल अध्ययन ही नहीं, बल्कि बोर्ड परीक्षाएं भी तीनों भाषाओं में आयोजित कराई जाएं, ताकि भाषाओं का ज्ञान मूल्यांकन आधारित बन सके और इसके दीर्घकालिक परिणाम सामने आएं। परिषद का कहना है कि इस नीति में कम से कम दो भारतीय भाषाओं को शामिल करने की अनिवार्यता देश की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को मजबूत करेगी।परिषद के अनुसार भारत एक स्वाभाविक बहुभाषी समाज है, जहां छात्र घर, विद्यालय और कार्यस्थल पर अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग करते हैं। ऐसे में कई भारतीय भाषाओं का ज्ञान छात्रों के भविष्य के लिए उपयोगी साबित होगा। अभाविप ने सीबीएसई द्वारा संथाली, मैथिली, डोगरी और कोंकणी समेत कुल 44 भाषाओं का विकल्प उपलब्ध कराने को सराहनीय कदम बताया।अभाविप के राष्ट्रीय मंत्री अभय प्रताप सिंह ने कहा कि सीबीएसई का यह निर्णय भारतीय शिक्षा के स्वदेशीकरण और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला है। उन्होंने कहा कि रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए बढ़ते अंतरराज्यीय प्रवास को देखते हुए भारतीय भाषाओं का ज्ञान छात्रों के लिए बेहद लाभकारी होगा। साथ ही पाठ्यपुस्तकों और शिक्षकों की उपलब्धता जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए बोर्ड द्वारा दिए गए लचीले प्रावधान भी सराहनीय हैं।प्रांत मंत्री दिनेश यादव ने कहा कि तीसरी भाषा का मूल्यांकन विद्यालय स्तर पर आंतरिक रखने से छात्रों पर बोर्ड परीक्षा का दबाव नहीं पड़ेगा और वे बिना तनाव के नई भाषा सीख सकेंगे। उन्होंने कहा कि अभाविप की मांग है कि त्रि-भाषा नीति को और प्रभावी बनाने के लिए बोर्ड परीक्षाएं भी तीनों भाषाओं में आयोजित की जाएं।