news-details

बायोगैस से बदलेगी ऊर्जा की तस्वीर, खेती भी होगी समृद्ध

You can share this post!

 

पारदर्शी विकास न्यूज़ लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में बायोगैस और बायोमास आधारित तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि, पशुपालन और सहकारिता विभाग के समन्वय से योजनाबद्ध तरीके से इन तकनीकों को लागू किया जाए तो प्रदेश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में आधुनिक बायोगैस संयंत्रों की ऐसी तकनीकें उपलब्ध हैं, जिनसे केवल भोजन पकाने के लिए गैस ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन और उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी तैयार की जा सकती है। इस प्राकृतिक खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और फसलों की पैदावार में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां बड़ी संख्या में पशुपालन होता है, वहां इस तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा सकता है।बताया गया कि भारत हर वर्ष एलपीजी गैस और रासायनिक उर्वरकों के कच्चे माल के आयात पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करता है। यदि उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में बायोगैस और बायोमास परियोजनाओं को बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। साथ ही रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से बंजर होती जमीन को भी बचाया जा सकेगा।इस दिशा में उत्तर प्रदेश की बी-पैक्स (प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समितियों) की उपविधियों में अक्षय ऊर्जा को शामिल करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। विशेषज्ञों का दावा है कि यदि इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो प्रदेश में लगभग 90 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित की जा सकती है। इसके अतिरिक्त बायोगैस के उपयोग से हर महीने करीब 3 करोड़ एलपीजी सिलेंडरों की बचत संभव है, जिससे घरेलू गैस की मांग और आयात दोनों में कमी आएगी।विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में अक्षय ऊर्जा से जुड़े अधिकांश कार्यक्रम यूपीनेडा के माध्यम से संचालित किए जा रहे हैं, लेकिन यदि इन योजनाओं में कृषि और पशुपालन विभागों की भी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए तो इसका लाभ सीधे किसानों तक पहुंचेगा। जिस प्रकार सोलर पंप योजना में विभिन्न विभागों के समन्वय से बेहतर परिणाम मिले हैं, उसी प्रकार बायोगैस और बायोमास आधारित योजनाओं में भी संयुक्त प्रयास अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बड़े स्तर पर सरकारी धन खर्च कर सीमित बिजली उत्पादन वाली परियोजनाओं के बजाय अक्षय ऊर्जा के स्थानीय और टिकाऊ मॉडल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे कम लागत में अधिक ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस दिशा में ठोस नीति और योजनाबद्ध क्रियान्वयन किया गया तो उत्तर प्रदेश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में देश के लिए एक मॉडल राज्य बन सकता है।