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121वें स्थापना दिवस पर ताड़पत्रीय पांडुलिपियों का दर्शन

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पारदर्शी विकास न्यूज़ वाराणसी । जैन घाट भदैनी स्थित श्री स्याद्वाद महाविद्यालय, वाराणसी के स्थापना के 121 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में श्रुत पंचमी पर्व पर दिनांक 19 जून 2026 को विविध कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया गया।कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रातः 7:00 बजे श्रुत पंचमी पूजन से हुआ। इसके उपरांत प्रातः 9:00 बजे स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया गया। सर्वप्रथम महाविद्यालय में संरक्षित लगभग 1500 वर्ष प्राचीन ताड़पत्रीय पाण्डुलिपियों एवं हस्तलिखित प्राचीन कागजीय ग्रंथों का अवलोकन कराया गया। तत्पश्चात उपस्थित अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती को अर्घ्य समर्पित किया गया तथा डॉ. निर्मला जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. राकेश कुमार, कुलसचिव, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय तथा विशिष्ट अतिथि प्रो. रामनारायण द्विवेदी, प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी, आर.सी. जैन एवं विजय कुमार जैन ने संस्थापक पूज्य गणेश प्रसाद वर्णी जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का उद्घाटन किया।इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. राकेश कुमार ने छात्रों की आधुनिक शिक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थापित स्मार्ट क्लास का लोकार्पण किया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अमित कुमार जैन ‘आकाश’ ने प्रस्तुतीकरण (PPT) के माध्यम से महाविद्यालय के गौरवशाली इतिहास, उपलब्धियों एवं भावी योजनाओं का परिचय कराया।काशी दिगम्बर जैन समाज के अध्यक्ष आर.सी. जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि महाविद्यालय का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है तथा संस्कृत एवं जैन अध्ययन के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि छात्रों की शिक्षा एवं संस्थान के विकास हेतु सम्पूर्ण जैन समाज सदैव सहयोग के लिए तत्पर रहेगा।विशिष्ट अतिथि प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने श्रुत पंचमी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसी दिन प्रथम जैन ग्रंथ का लेखन पूर्ण हुआ था। उन्होंने बताया कि पंचमी तिथि ज्योतिषीय दृष्टि से पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है तथा इसी शुभ तिथि पर स्थापित यह संस्था आज 121 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा पूर्ण कर रही है। उन्होंने जैन दर्शन के सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक पक्षों की भी सराहना की।मुख्य अतिथि डॉ. राकेश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि उन्होंने श्री स्याद्वाद महाविद्यालय का नाम पूर्व से ही सुन रखा था, परन्तु आज गंगातट स्थित इस पवित्र परिसर में आकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा कि यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियाँ वास्तव में एक समृद्ध शास्त्रभण्डार हैं, जिनका लाभ विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अवश्य लेना चाहिए। उन्होंने जैन दर्शन के स्याद्वाद एवं अनेकान्तवाद को वर्तमान समय की अनेक समस्याओं के समाधान का मार्गदर्शक बताते हुए अपने अनुभव भी साझा किए।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी ने कहा कि वे स्वयं इसी महाविद्यालय के छात्र रहे हैं और जीवन में जो भी उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं, उनमें इस संस्थान का महत्वपूर्ण योगदान है।