

सुशील कुमार
पारदर्शी विकास न्यूज़
दीनदयाल अंत्योदय योजना और सामाजिक न्याय के व्यापक ढांचे के अंतर्गत भारत में DNT (De-notified Tribes), NT (Nomadic Tribes) और SNT (Semi-Nomadic Tribes) ऐसे समुदायों के रूप में पहचाने जाते हैं, जिनका ऐतिहासिक जीवन घुमंतू परंपराओं, सामाजिक हाशिए और प्रशासनिक उपेक्षा से जुड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश का धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी (बनारस) इन समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ परंपरा, शहरीकरण और आधुनिक विकास के बीच इन समुदायों का जीवन निरंतर परिवर्तनशील बना हुआ है। वाराणसी में इन समुदायों की स्थिति ब्रिटिश काल की उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ी है, जब “क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट” के तहत कई घुमंतू जातियों को अपराधी घोषित कर दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद इस कानून को समाप्त कर दिया गया और इन समुदायों को “de-notified” किया गया, लेकिन इसके बावजूद सामाजिक कलंक और आर्थिक पिछड़ापन पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका। आज भी बनारस में DNT, NT और SNT समुदायों के अनेक परिवार सामाजिक रूप से हाशिए पर जीवन जीते हैं और उन्हें स्थायी सामाजिक पहचान एवं आर्थिक स्थिरता प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वाराणसी जिले में इन समुदायों की उपस्थिति मुख्य रूप से शहर के बाहरी इलाकों, नदी किनारों, रेलवे लाइनों के पास, स्लम बस्तियों और ग्रामीण-शहरी संक्रमण क्षेत्रों में देखी जाती है। सारनाथ, राजातालाब, सेवापुरी और शहर के बाहरी वार्डों में इनकी सघन उपस्थिति पाई जाती है। इनमें सपेरे, नट, मदारी, बाजीगर, कंजर, बंजारा और अन्य घुमंतू जातियों से जुड़े परिवार शामिल हैं। समय के साथ कुछ परिवार स्थायी बसावट की ओर बढ़े हैं, लेकिन बड़ी संख्या अभी भी अस्थायी और प्रवासी जीवन शैली पर निर्भर है। इन समुदायों की अनुमानित जनसंख्या के संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनके सटीक आंकड़े सरकारी जनगणना में एकीकृत रूप से उपलब्ध नहीं हैं। कई परिवारों का जीवन प्रवास और अस्थायी निवास पर आधारित होने के कारण वे स्थायी रिकॉर्ड में पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाते। फिर भी सामाजिक और स्थानीय प्रशासनिक आकलनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वाराणसी जिले में DNT, NT और SNT समुदायों की संयुक्त जनसंख्या कुछ हजार से लेकर कुछ दसियों हजार के बीच हो सकती है। यह संख्या कुल जनसंख्या का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है, लेकिन सामाजिक संरचना में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा के क्षेत्र में इन समुदायों की स्थिति अभी भी कमजोर बनी हुई है। आर्थिक अस्थिरता, लगातार प्रवास और सामाजिक भेदभाव के कारण इन परिवारों के बच्चों का स्कूल छोड़ने का प्रतिशत अधिक देखा जाता है। हालांकि सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आवासीय विद्यालयों और ओपन स्कूलिंग जैसी व्यवस्थाओं ने स्थिति में कुछ सुधार किया है, लेकिन उनका प्रभाव अभी सीमित है। शिक्षा तक निरंतर पहुंच की कमी इनके विकास में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी इन समुदायों के लिए एक चुनौती है। अस्थायी निवास और पहचान दस्तावेजों की कमी के कारण कई परिवार नियमित स्वास्थ्य प्रणाली से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। परिणामस्वरूप प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ इन तक सीमित रूप में ही पहुंच पाता है। रोजगार के दृष्टिकोण से देखा जाए तो वाराणसी में इन समुदायों की आजीविका मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र पर आधारित है। निर्माण कार्य, दैनिक मजदूरी, फेरी लगाना, छोटे व्यापार, लोक कला और पर्यटन आधारित सेवाएं इनके प्रमुख रोजगार स्रोत हैं। काशी का धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन कुछ अवसर प्रदान करता है, जैसे नाविक, हस्तशिल्प, पारंपरिक प्रदर्शन और स्थानीय गाइड की भूमिका, लेकिन यह रोजगार अस्थिर और मौसमी प्रकृति का होता है। सरकारी योजनाओं का प्रभाव इन समुदायों तक धीरे-धीरे पहुंच रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने कुछ परिवारों को लाभ पहुंचाया है, लेकिन पहचान पत्रों की कमी और स्थायी पते के अभाव के कारण कई लोग अब भी इन योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। स्थानीय प्रशासन द्वारा समय-समय पर विशेष शिविर और पंजीकरण अभियान चलाए गए हैं, जिससे स्थिति में आंशिक सुधार देखा गया है। सामाजिक स्तर पर इन समुदायों के प्रति भेदभाव की प्रवृत्ति अभी भी कुछ हद तक मौजूद है, हालांकि शहरीकरण और शिक्षा के प्रसार ने इसमें कमी लाई है। नई पीढ़ी शिक्षा और स्थायी रोजगार की ओर अग्रसर हो रही है, जो एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वाराणसी में DNT, NT और SNT समुदाय एक संक्रमणकालीन स्थिति में हैं। एक ओर वे अपने पारंपरिक घुमंतू जीवन से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संरचनात्मक बाधाएं उनके पूर्ण सामाजिक-आर्थिक समावेशन में बाधा बनी हुई हैं। सटीक जनसंख्या आंकड़ों की कमी नीति निर्माण और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में एक बड़ी चुनौती है। इसलिए आवश्यक है कि इन समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए अधिक समावेशी नीतियाँ, बेहतर डेटा संग्रह और सतत सामाजिक समर्थन सुनिश्चित किया जाए।