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प्रोफेसर गुरुचरण सिंह नेगी निदेशक बनाए गए, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने भावभीनी विदाई दी

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ज्ञान केवल अर्जन का साधन नहीं, जीवन का संस्कार पालि भाषा और बौद्ध साहित्य के विकास में प्रोफेसर नेगी का अद्वितीय योगदान रहा

Pardarshi Vikas News Lucknow

केन्द्रीय संस्कृत विश्व विद्यालय लखनऊ के सह-निर्देशक और बौद्ध दर्शन विद्या शाखा के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर गुरुचरण सिंह नेगी को  विश्व विद्यालय के एकलव्य परिसर, अगरतला -त्रिपुरा का निदेशक नियुक्त किया गया है। बुधवार को विश्व विद्यालय में एक भव्य समारोह आयोजित करके प्रोफेसर नेगी को भावभीनी विदाई दी गई।
 प्रोफेसर डॉ प्रफुल्ल गडपाल ने कहा कि विश्व विद्यालय के लिए उनकी सेवाएं हमेशा अविस्मरणीय रहेंगी।
 विश्व बौद्ध संघ के राष्ट्रीय संरक्षक आर सी बौद्ध ने प्रोफेसर नेगी को नयी जिम्मेदारी मिलने पर बधाई और मंगलकामनाएं दीं हैं।
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के सह-निदेशक, बौद्ध दर्शन विद्याशाखा के विभागाध्यक्ष तथा पालि अध्ययन एवं अनुसन्धान केन्द्र के समन्वयक प्रो. गुरुचरण सिंह नेगी को विश्वविद्यालय के एकलव्य परिसर, अगरतला (त्रिपुरा) का निदेशक नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति विश्वविद्यालय परिवार के लिए अत्यंत गर्व का विषय है—क्योंकि प्रो. नेगी न केवल विद्या और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान हैं, बल्कि सृजनशीलता, कर्तव्यपरायणता, सौहार्द और मानवीय संवेदनशीलता के मूर्त रूप भी हैं।
भोट भाषा, बौद्ध दर्शन तथा पालि साहित्य के विद्वान के रूप में उनकी प्रतिष्ठा उत्तर-मध्य भारत के साथ-साथ हिमालय क्षेत्र में भी समान रूप से प्रतिष्ठित है। हिमालयी राज्यों के लामा समुदाय तथा वहाँ के अध्यापक वर्ग में प्रो. नेगी को गहरी श्रद्धा एवं आदर की दृष्टि से देखा जाता है। वर्ष 2006 में लखनऊ परिसर में अपने अध्यापन जीवन का शुभारम्भ करने वाले प्रो. नेगी ने पिछले दो दशकों में बौद्ध दर्शन के गूढ़ विषयों को सरल संवादात्मक शैली में विद्यार्थियों तक पहुँचाया। उनकी कक्षा अध्ययन-अध्यापन का मात्र स्थल ही नहीं, बल्कि संवाद, विचार एवं आत्मपरिष्कार का जीवंत मंच रही है। विद्यार्थियों के प्रति उनका दृष्टिकोण सदैव स्नेहपूर्ण और आत्मीय रहा है। वे शिक्षा को ज्ञान-वितरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मित्रता और मानवीय संवेदना के विस्तार का माध्यम मानते हैं। इसीलिए विद्यार्थी उनके प्रति गहन आदर, स्नेह और आत्मीय विश्वास रखते हैं।
लखनऊ परिसर के परिसर निदेशक प्रो. सर्वनारायण झा ने इस अवसर पर कहा कि “प्रशासनिक क्षेत्र में भी प्रो. नेगी संतुलन, संयम और दक्षता के अनुपम उदाहरण हैं। लखनऊ परिसर में सह-निदेशक के रूप में उन्होंने कार्य-संस्कृति में पारदर्शिता, संवाद और सहयोग की परंपरा को सुदृढ़ किया। उनके सह-निर्देशन में परिसर एक परिवार की भाँति विकसित हुआ, जहाँ शिक्षा और सृजन का वातावरण निरंतर पुष्पित हुआ। उन्होंने विश्वविद्यालय की NAAC एवं IQAC समितियों में महत्वपूर्ण दायित्वों का कुशल निर्वहन करते हुए गुणवत्ता संवर्धन की ठोस नींव रखी। आत्म-आकलन, निरीक्षण और सतत सुधार की दृष्टि से उन्होंने संस्थान को नयी दिशा प्रदान की। उनकी संवेदनशीलता, प्रशासनिक दूरदर्शिता और मानवीय दृष्टि निश्चय ही एकलव्य परिसर, अगरतला को नयी ऊर्जा, नवीन दृष्टि और नये आदर्श प्रदान करेगी। विश्वविद्यालय परिवार को विश्वास है कि उनके नेतृत्व में एकलव्य परिसर बौद्धिकता और संस्कार का जीवंत संगम बनकर और अधिक प्रखर रूप में प्रतिष्ठित होगा।”
बौद्धदर्शन विद्याशाखा के संयोजक डा. प्रफुल्ल गड़पाल का कहना है कि “सहकर्मियों के लिए वे सदैव “सुखा ते छाया समण!” (राहुल-बुद्ध संवाद) की स्मृति जगाने वाले व्यक्ति सिद्ध हुए—जो अपने विज्ञान, विनम्रता और स्नेह से सबको वटवृक्ष की सघन छाया समान आश्रय प्रदान करते हैं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान की प्रशस्ति, करुणा की सरिता और मैत्री का विस्तार सहज रूप में प्रवाहित होता है। परिसर में कोई भी व्यक्ति उनके सान्निध्य में पहुँचे तो आत्मीय सौहार्द का अनुभव करता है। उनकी प्रसंगानुकूल हास्य-शैली और मधुर व्यवहार के कारण अध्यापन सदैव रोचक और जीवनस्पर्शी बनता है।”
डॉ. प्रदीप कुमार द्विवेदी ने कहा कि पालि अध्ययन एवं अनुसन्धान केन्द्र के समन्वयक के रूप में उनका कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने पालि भाषा और बौद्ध साहित्य के अध्ययन के लिए नवोन्मेषी परिवेश तैयार किया तथा सम्पादन और प्रकाशन के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय ग्रंथ और शोध-संग्रह प्रस्तुत किए। उनके सम्पादन कार्यों में गम्भीरता, सटीकता और साहित्यिक माधुर्य का सुंदर संयोजन दिखाई देता है।”
बौद्धदर्शन की विश्रुत विदुषी डॉ. कृष्णा कुमारी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि “उनकी विद्वत्ता, शैक्षणिक योगदान और सृजनशील सेवाओं के सम्मान में वर्ष 2026 में उन्हें ‘कुलपति शिक्षा-विभूषण सम्मान’ प्रदान किया गया। इस सम्मान के अंतर्गत प्रमाण-पत्र एवं एक लाख रुपये की धनराशि दी जा रही है, जो उनके दीर्घकालिक शैक्षिक योगदान की आधिकारिक स्वीकृति है।“ सत्यतः प्रो. गुरुचरण सिंह नेगी का व्यक्तित्व इस सत्य को मूर्त करता है कि ज्ञान केवल अर्जन का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है।